प्रकाश प्रभाकर की पुस्तक ‘वन उपवन’ का लोकार्पण और काव्य-चेतना को समर्पित गोष्ठी
प्रकाश प्रभाकर की पुस्तक ‘वन उपवन’ का लोकार्पण और काव्य-चेतना को समर्पित गोष्ठी
चंडीगढ़, 29 सितंबर: पंजाबी अध्ययन स्कूल, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ और नाद प्रगासु, श्री अमृतसर द्वारा संयुक्त रूप से प्रसिद्ध कवि स्व. प्रकाश प्रभाकर की काव्य–रचना पर केंद्रित पुस्तक लोकार्पण एवं गोष्ठी का आयोजन पंजाब विश्वविद्यालय के आई.सी.एस.एस.आर. हॉल में किया गया। इस अवसर पर प्रकाश प्रभाकर की कविताओं के संपादित संकलन ‘वन उपवन’ का लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम के आरंभ में प्रो. परमजीत कौर सिद्धू, अध्यक्ष, पंजाबी अध्ययन स्कूल, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ ने सभी अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि प्रकाश प्रभाकर की कविता अपनी सहजता, विशिष्टता और गहरी संवेदना के कारण पाठक को अपने साथ जोड़ती है। उन्होंने कहा कि लंबे अंतराल के बाद उनकी कविता पर हो रही यह चर्चा उनकी काव्य–विरासत को नए संदर्भों में समझने का अवसर प्रदान करेगी।
इसके उपरांत स्व. प्रकाश प्रभाकर की धर्मपत्नी ने उनके जीवन से जुड़े भावुक क्षणों को याद करते हुए उनके काव्य–सफर और रचनात्मक जीवन से जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। ‘वन उपवन’ के संपादक संदीप शर्मा ने पुस्तक के संपादन की प्रक्रिया तथा प्रकाश प्रभाकर की कविता के विभिन्न पक्षों के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की। अध्यक्षीय मंडल में शामिल प्रो. गुरपाल सिंह संधू ने कहा कि प्रकाश प्रभाकर की कविता में सिद्धांत और नियमों से जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर तलाशे जा सकते हैं। उन्होंने प्रभाकर जी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंध और उनसे जुड़ी स्मृतियों को भी साझा किया। प्रो. योगराज अंगरिश ने प्रभाकर की कविता में विद्यमान मासूमियत और आध्यात्मिकता को रेखांकित करते हुए इसके विशिष्ट काव्य–स्वभाव पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रो. सरबजीत सिंह ने कहा कि उनकी कविता आधुनिक तेवर वाली कविता है, जो पाठक को अर्थों की सृजना के लिए व्यापक स्वतंत्रता प्रदान करती है। डॉ. प्रवीण कुमार ने प्रभाकर की कविता को ‘प्रेम की कविता’ बताते हुए उसमें विद्यमान मानवीय संवेदना को उजागर किया।
पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से पहुंचे प्रो. राजिंदरपाल बराड़ ने प्रकाश प्रभाकर से जुड़ी अपनी जीवन–स्मृतियां साझा करते हुए कहा कि वे किसी विशेष समय या दौर के कवि नहीं थे, बल्कि व्यक्तित्व और काव्य–दृष्टि की दृष्टि से एक परिपक्व कवि थे। विचार–चर्चा के दौरान डॉ. इमरतपाल सिंह, डॉ. अमरजीत सिंह, अलमित्रा प्रभाकर, इसिज प्रभाकर, डॉ. दविंदर सिंह और हीरा सिंह ने भी सक्रिय रूप से भाग लेते हुए प्रकाश प्रभाकर की कविता और उनके व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पक्षों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. जगदीश सिंह, निदेशक, नाद प्रगासु, श्री अमृतसर ने कार्यक्रम में शामिल सभी विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं परिवार के सदस्यों का धन्यवाद किया। मंच संचालन की भूमिका डॉ. हरकमलप्रीत सिंह ने बखूबी निभाई।
इस साहित्यिक कार्यक्रम में शोधार्थियों और विद्यार्थियों के अलावा स्व. प्रकाश प्रभाकर के परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों तथा साहित्य–प्रेमियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। ‘वन उपवन’ के लोकार्पण के साथ प्रकाश प्रभाकर की काव्य–विरासत को पुनः साहित्यिक संवाद के केंद्र में लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास हुआ।

