‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ ने दर्शकों को किया भावुक और चिंतनशील
‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ ने दर्शकों को किया भावुक और चिंतनशील
चंडीगढ़: पंजाबी साहित्य सभा, पंजाबी अध्ययन स्कूल, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ द्वारा आयोजित प्रसिद्ध कहानीकार मोहन भंडारी की चर्चित कहानी ‘मैनूँ टैगोर बना दे माँ’ से प्रभावित सोलो नाटक ‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ की प्रस्तुति जम्मू से आए रंगकर्मी लक्की ज़ी गुप्ता द्वारा की गई। मोहन सिंह दीवाना हॉल में हुई इस प्रस्तुति ने दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक वास्तविकताओं के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया।
लक्की ज़ी गुप्ता की इस सोलो प्रस्तुति की विशेषता यह रही कि उन्होंने अकेले ही विभिन्न पात्रों को अपने अभिनय के माध्यम से मंच पर साकार किया। समाज के हाशिए पर खड़े तथा अपनी अधूरी आकांक्षाओं से जूझते पात्रों की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रस्तुति नाटक का महत्वपूर्ण पक्ष रही। लक्की ज़ी ने प्रस्तुति के दौरान दर्शकों में से ही कुछ व्यक्तियों को नाटक के पात्रों के रूप में शामिल करके मंच और दर्शकों के बीच की पारंपरिक दूरी को तोड़ दिया। इस रचनात्मक तकनीक ने प्रस्तुति को और अधिक जीवंत एवं प्रभावशाली बनाया और दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद लिया। सीमित मंचीय साधनों का उपयोग करते हुए मंच की रचनात्मकता और विभिन्न पात्रों का प्रभावशाली चित्रण लक्की ज़ी की रंगमंचीय पकड़ को दर्शाता रहा।
इस अवसर पर पंजाबी अध्ययन स्कूल की चेयरपर्सन डॉ. परमजीत कौर सिद्धू ने लक्की ज़ी गुप्ता को सफल और प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि नाटक के विभिन्न पात्रों की प्रस्तुति और उनके आंतरिक संघर्षों को जिस संवेदनशीलता के साथ मंच पर साकार किया गया, वह दर्शकों के मन को झकझोर देने वाला था। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में इस प्रकार की रंगमंचीय प्रस्तुतियाँ विद्यार्थियों और शोधार्थियों को साहित्य से जोड़ने के साथ-साथ समाज को कलात्मक एवं संवेदनशील दृष्टि से समझने का अवसर भी प्रदान करती हैं। उन्होंने इस अनूठी प्रस्तुति के लिए लक्की ज़ी गुप्ता का धन्यवाद किया। प्रसिद्ध नाटककार पाली भूपिंदर ने प्रस्तुति की सराहना करते हुए इसे सोलो नाटक की विधा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि एक ही कलाकार द्वारा विभिन्न पात्रों को प्रभावशाली ढंग से जीवंत करना कलाकार की अभिनय एवं निर्देशन क्षमता का प्रमाण है।
इस अवसर पर प्रो. योगराज, प्रो. उमा सेठी, प्रो. अक्विंदर कौर तनवी, डॉ. पवन, रवि कुमार, डॉ. सुखजीत कौर, जसपाल सिंह के अलावा पंजाबी, संस्कृत एवं फ्रेंच विभागों के शोधार्थी, विद्यार्थी तथा रंगमंच प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए।

